भूमंडलीकरण के इस दौर में दुनिया बेहद क़रीब आ चुकी है. एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचने में कुछ घंटे भर लगते हैं. आवाज़ से भी तेज़ उड़ने वाले विमान आ गए हैं. तेज़ चलने वाले जहाज़ बन गए हैं, जो कुछ ही व क़्त में सफ़र पूरा कर लेते हैं. लेकिन आज से कुछ स दी पहले ऐसा नहीं था. दुनिया के तमाम को नों के बारे में सबको पता नहीं था. लोग, जहाज़ पर सवार होकर नई दुनिया की खोज के लिए निकल पड़ ते थे. अनजान, मुश्किल रास्तों से गुज़रते थे. इसी तरह से अमरीका, ऑस्ट्रेलिया औ र न्यूज़ीलैंड की खोज, यूरोपीय नाविकों ने की और अपने उपनिवेश बनाए. पहले यूरोप से होकर ऑस्ट्रेलिया जाने के लिए पूरे दक्षिण अमरीका का चक्कर लगाना पड़ ता था. अंटार्कटिका और दक्षिण अमरीका के बीच स्थित मैगलेन की जलसंधि हो ते हुए नाविक ये सफ़र पूरा करते थे. बाद में मध्य अमरीका में पनामा नहर बनी, तो ये सफ़र छोटा हो गया. लेकिन, पनामा न हर संकरी है. बड़े जहाज़ों को आज भी मैगलेन की जलसंधि से होकर ही जाना पड़ता है. आज से क़रीब 70 बरस पहले मेरे दादा भी ऑस्ट्रेलिया से नई ज़िंदगी की तलाश में इंग्लैंड इसी रास्ते से होकर पहुंचे थे. मैगल...