भूमंडलीकरण के इस दौर में दुनिया बेहद क़रीब आ चुकी है. एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचने में कुछ घंटे भर लगते
हैं. आवाज़ से भी तेज़ उड़ने वाले विमान आ गए हैं. तेज़ चलने वाले जहाज़ बन गए हैं, जो कुछ ही वक़्त में सफ़र पूरा कर लेते हैं.
लेकिन आज से
कुछ सदी पहले ऐसा नहीं था. दुनिया के तमाम कोनों के बारे में सबको पता नहीं
था. लोग, जहाज़ पर सवार होकर नई दुनिया की खोज के लिए निकल पड़ते थे. अनजान, मुश्किल रास्तों से गुज़रते थे. इसी तरह से अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की खोज, यूरोपीय नाविकों ने की और अपने उपनिवेश बनाए.पहले यूरोप से होकर ऑस्ट्रेलिया जाने के लिए पूरे दक्षिण अमरीका का चक्कर लगाना पड़ता था. अंटार्कटिका और दक्षिण अमरीका के बीच स्थित मैगलेन की जलसंधि होते हुए नाविक ये सफ़र पूरा करते थे.
बाद में मध्य अमरीका में पनामा नहर बनी, तो ये सफ़र छोटा हो गया. लेकिन, पनामा नहर संकरी है. बड़े जहाज़ों को आज भी मैगलेन की जलसंधि से होकर ही जाना पड़ता है.
आज से क़रीब 70 बरस पहले मेरे दादा भी ऑस्ट्रेलिया से नई ज़िंदगी की तलाश में इंग्लैंड इसी रास्ते से होकर पहुंचे थे.
मैगलेन की जलसंधि की खोज की इस साल पांच सौवीं सालगिरह मनाई जा रही है. पुर्तगाली अन्वेषक फर्डीनेंड मैगलेन ने पांच सदी पहले इस समुद्री रास्ते की खोज की थी. वो यहां से गुज़रते हुए प्रशांत महासागर स्थित द्वीपों तक पहुंचे थे.
जब मैं छोटा था, तो मेरे दादा अक्सर 1949 के अपने सफ़र के क़िस्से बताते थे. उस साल वो ऑस्ट्रेलिया से पामीर नाम के जहाज़ पर सवार होकर इंग्लैंड के लिए निकले थे. पामीर, जर्मनी का जहाज़ था और अपने चार मस्तूलों की वजह से बहुत मशहूर था. वो ऑस्ट्रेलिया के एडीलेड शहर के पोर्ट एलिज़ाबेथ बंदरगाह से इंग्लैंड के कॉर्नवाल शहर के फालमाउथ बंदरगाह के लिए रवाना हुआ था.
पामीर में अनाज की 60 हज़ार बोरियां लदी हुई थीं. ये पामीर जहाज़ का समुद्री रास्ते ड्रेक पैसेज से होते हुए आख़िरी सफ़र था. और ये आख़िरी बार था, जब कोई कारोबारी जहाज़ दक्षिणी चिली के हॉर्न अंतरीप से होते हुए गुज़रा.
अपने दादा के उस ऐतिहासिक सफ़र को दोबारा जीने के लिए मैंने क्रूज़ लाइनर वेंटस ऑस्ट्रैलिस से दक्षिणी चिली के दुर्गम इलाक़े से गुज़रने की ठानी.
वेंटस ऑस्ट्रेलिस को चिली के दक्षिणी हिस्से पुंता अरेनास से होकर गुज़रना था, जो मैगलेन जलसंधि का हिस्सा है. चार दिन का मेरा ये सफ़र एक नए तजुर्बे के लिए था. मैं अपने दादा के उस तजुर्बे को दोबारा जीना चाहता था, जो आज से 70 साल पहले के सफ़र में उन्होंने किया था. ये सफ़र इतना रोमांचक था कि मेरे दादा जीवन के आख़िरी मौक़े तक केप हॉर्न से गुज़रने के क़िस्से बताते रहते थे.
मेरे दादा की अपने पिता से नहीं पटती थी. वो ऑस्ट्रेलिया में रहते थे. पर, इंग्लैंड जाकर नई ज़िंदगी शुरू करने के सपने देखते थे. जब पामीर कारोबारी जहाज़ से इंग्लैंड जाने का ऑफ़र मिला, तो मेरे दादा बिना किसी को बताए, इस सफ़र पर निकल पड़े. वो एडीलेड में पामीर जहाज़ पर सवार हुए थे. उन्हें इंग्लैंड के बारे में कुछ ख़ास जानकारी नहीं थी. बस लोगों से सुना भर था कि वहां की ज़िंदगी बेहतरीन है.
पामीर पर वो 33 दूसरे लोगों के साथ चालक दल का हिस्सा थे. मेरे दादा को सफ़र के दौरान 18 घंटे तक काम करना पड़ता था. वो ज़्यादातर किचेन से लेकर डेक तक की सफ़ाई करते थे. सफ़र 128 दिन लंबा था. लेकिन, मेरे दादा एक बार इंग्लैंड पहुंचे, तो दोबारा घर नहीं गए. कॉर्नवाल में जहाज़ से उतरकर वो ग्रामीण इलाक़े में चले गए. इसके बाद वो अगले 54 साल तक यानी 2003 में अपनी मौत तक वहीं रहे.
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