बिहार सरकार ने इस साल सबसे अधिक धन शिक्षा के मद में ही आवंटित किया
है. राज्य सरकार की तरफ़ से सर्व शिक्षा अभियान के लिए 14,352 करोड़ और
मध्याह्न भोजन के लिए 2,374 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है.
आख़िर इतना पैसे खर्च करने के बावजूद भी हालात सुधर क्यों नहीं रहे?
इसका जवाब राजभवन वाले स्कूल के शिक्षक अशोक कुमार की एक बात से मिल रहा था. उन्होंने बताया कि उनके स्कूल के एक छात्र के पास अभी तक किताबें नहीं थीं.
उन्होंने बताया, "जब निरीक्षण करने अधिकारी आए थे तो उसने ख़ुद ही बता दिया था कि किताब खरीदने के लिए जो 300 रुपये उसके खाते में आए थे, उसके पिताजी ने निकाल कर मुर्गा खरीद लिया."
अभी तक इस सवाल का जवाब नहीं मिल पाया था कि किन शिक्षकों की वजह से शिक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगे हैं और क्या शिक्षा की बदहाली के ज़िम्मेदार वही हैं.
बिहार नियोजित शिक्षक संघ के प्रतिनिधि अमित विक्रम कहते हैं, "केवल कुछ लोगों की वजह से पूरे शिक्षक समुदाय को दोष देना ठीक नहीं है. जिन्होंने धांधली की है, वे जांच में पकड़े जाएंगे. सवाल उन्हीं पर उठे हैं जिनका नियोजन TET के पहले हुआ था. तब नियोजन इकाई पंचायतें हुआ करती थी. मुखिया और पंचायत सेवक की सिफ़ारिश और प्रमाण पत्रों की मेरिट के आधार पर केवल नियोजन होता था. जब से TET परीक्षा आ गई, नियोजन की प्रक्रिया भी बदल गई है. अब वही शिक्षक बन सकते हैं जिन्होंने प्रारंभिक स्तर पर TET और सेकेंडरी स्तर पर STET की परीक्षा पास की हो."
बिहार शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड्स के मुताबिक राज्य में कुल 4.40 लाख शिक्षक कार्यरत हैं.
प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में 3.19 लाख नियोजित शिक्षक हैं, 70000 नियमित शिक्षक. उच्च और उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में 37,000 नियोजित शिक्षक हैं और 7,000 नियोजित शिक्षक.
साल 2000 तक आख़िरी बार बीपीएससी द्वारा नियमित शिक्षकों की बहाली की गई थी. फिर नीतीश सरकार ने शिक्षामित्र बहाल किए. 2003 में पहली बार शिक्षकों का नियोजन हुआ.
भारत के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर जारी किए जाने वाले देश भर के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों और छात्रों के डेटाबेस (U-DISE) के अनुसार बिहार में शिक्षक छात्र अनुपात 1:52 है, जबकि मानक रूप से 1:40 होना चाहिए. नई शिक्षा नीति के अनुसार यह घटाकर 35 कर दिया गया है. इस लिहाज से बिहार में अभी 1.25 लाख शिक्षकों की ज़रूरत है.
आरा ज़िला के मथुरापुर पंचायत के लौंग बाबा के मठिया स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय में स्कूल लेट से खुलने के सवाल पर हेडमास्टर राज किशोर कहने लगे कि वो दूर से आते हैं और सारा काम उन्हीं को करना होता है.
वो कहते हैं, "उम्र 60 को पार करने वाली है. तीन महीने की नौकरी बची है. मगर इस उम्र में भी फल, सब्ज़ी लेकर आने से चॉक-डस्टर तक सबकुछ हम ही लाते हैं. नियोजित शिक्षकों की तरह सरकार ने हमें भी बैल समझ लिया है.''
बातचीत के बीच वो हमें ऊपर लेकर गए. ओसारे में फ़र्श पर लाइन से छात्र छात्राएं बैठीं थीं. एक शिक्षक उनके बीच फ़ोन पर बात करते हुए टहल रहे थे. हमें तस्वीरें लेते देख झट से अंदर कमरे में जाकर बात करने लगे.
हेडमास्टर ने उपस्थिति का रजिस्टर दिखाया. पहली कक्षा में 13 बच्चों का नामांकन था और पांचवी में 32 छात्र थे. इस पर हेडमास्टर राजकिशोर ने कहा कि पास के ही दो विद्यालय बंद हुए हैं. उन्हीं के छात्र हैं जिससे पांचवी में संख्या बढ़ गई है.
वहीं, सातवीं और आठवीं आते-आते तक बच्चों की संख्या का आंकडा 40 को पार कर गया है. आठवीं में 48 बच्चों का नामांकन दर्ज था. हेडमास्टर ने कहा कि इसका पता नहीं चल पा रहा है कि इतने बच्चे कहां से आ गए हैं.
इसी स्कूल के बगल में 100 मीटर की दूरी पर एक प्राइवेट स्कूल चलता है. टीन के शेड के अंदर ही. लेकिन उसमें इस स्कूल से तिगुने अधिक बच्चे हैं. आख़िर ऐसा क्यों?
हेडमास्टर राजकिशोर के बोलने से पहले ही वो शिक्षक बोल पड़े जो फ़ोन से करते हुए क्लास में टहल रहे थे, "ये सब करप्शन की वजह से है."
हमने पूछा करप्शन कर कौन रहा है? इस पर दोनों चुप हो गए.
एएन सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर कहते हैं, "एजुकेशन सिस्टम में गड़बड़ी की शुरुआत यहीं से हुई. नियोजन की प्रक्रिया में कई ख़ामियां थीं. मुखिया, सरपंच, सचिव मिलकर शिक्षक बना रहे थे. जो जिसका चहेता था, उसने उसको शिक्षक बनाया."
पंचायत स्तर पर नियोजन की यह प्रक्रिया साल 2009-10 तक चली. तब TET आया. लेकिन तब तक करीब एक लाख शिक्षकों का नियोजन हो चुका था.
डीएम दिवाकर नियोजित शिक्षकों के राजनीतिक पक्ष की भी बात करते हैं.
वो कहते हैं, "आज के समय में नियोजित शिक्षक एक बड़ा वोटबैंक हैं. ये सबको पता है. इनकी संख्या भर (4.14 लाख) पर न जाएं. इनका प्रभाव एक बड़ी आबादी पर है. वो कई लाख हैं. जो सरकार बनाने की इच्छा रखता होगा वो इनके ख़िलाफ़ जाने की हिम्मत कभी नहीं करेगा."
आख़िर इतना पैसे खर्च करने के बावजूद भी हालात सुधर क्यों नहीं रहे?
इसका जवाब राजभवन वाले स्कूल के शिक्षक अशोक कुमार की एक बात से मिल रहा था. उन्होंने बताया कि उनके स्कूल के एक छात्र के पास अभी तक किताबें नहीं थीं.
उन्होंने बताया, "जब निरीक्षण करने अधिकारी आए थे तो उसने ख़ुद ही बता दिया था कि किताब खरीदने के लिए जो 300 रुपये उसके खाते में आए थे, उसके पिताजी ने निकाल कर मुर्गा खरीद लिया."
अभी तक इस सवाल का जवाब नहीं मिल पाया था कि किन शिक्षकों की वजह से शिक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगे हैं और क्या शिक्षा की बदहाली के ज़िम्मेदार वही हैं.
बिहार नियोजित शिक्षक संघ के प्रतिनिधि अमित विक्रम कहते हैं, "केवल कुछ लोगों की वजह से पूरे शिक्षक समुदाय को दोष देना ठीक नहीं है. जिन्होंने धांधली की है, वे जांच में पकड़े जाएंगे. सवाल उन्हीं पर उठे हैं जिनका नियोजन TET के पहले हुआ था. तब नियोजन इकाई पंचायतें हुआ करती थी. मुखिया और पंचायत सेवक की सिफ़ारिश और प्रमाण पत्रों की मेरिट के आधार पर केवल नियोजन होता था. जब से TET परीक्षा आ गई, नियोजन की प्रक्रिया भी बदल गई है. अब वही शिक्षक बन सकते हैं जिन्होंने प्रारंभिक स्तर पर TET और सेकेंडरी स्तर पर STET की परीक्षा पास की हो."
बिहार शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड्स के मुताबिक राज्य में कुल 4.40 लाख शिक्षक कार्यरत हैं.
प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में 3.19 लाख नियोजित शिक्षक हैं, 70000 नियमित शिक्षक. उच्च और उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में 37,000 नियोजित शिक्षक हैं और 7,000 नियोजित शिक्षक.
साल 2000 तक आख़िरी बार बीपीएससी द्वारा नियमित शिक्षकों की बहाली की गई थी. फिर नीतीश सरकार ने शिक्षामित्र बहाल किए. 2003 में पहली बार शिक्षकों का नियोजन हुआ.
भारत के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर जारी किए जाने वाले देश भर के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों और छात्रों के डेटाबेस (U-DISE) के अनुसार बिहार में शिक्षक छात्र अनुपात 1:52 है, जबकि मानक रूप से 1:40 होना चाहिए. नई शिक्षा नीति के अनुसार यह घटाकर 35 कर दिया गया है. इस लिहाज से बिहार में अभी 1.25 लाख शिक्षकों की ज़रूरत है.
आरा ज़िला के मथुरापुर पंचायत के लौंग बाबा के मठिया स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय में स्कूल लेट से खुलने के सवाल पर हेडमास्टर राज किशोर कहने लगे कि वो दूर से आते हैं और सारा काम उन्हीं को करना होता है.
वो कहते हैं, "उम्र 60 को पार करने वाली है. तीन महीने की नौकरी बची है. मगर इस उम्र में भी फल, सब्ज़ी लेकर आने से चॉक-डस्टर तक सबकुछ हम ही लाते हैं. नियोजित शिक्षकों की तरह सरकार ने हमें भी बैल समझ लिया है.''
बातचीत के बीच वो हमें ऊपर लेकर गए. ओसारे में फ़र्श पर लाइन से छात्र छात्राएं बैठीं थीं. एक शिक्षक उनके बीच फ़ोन पर बात करते हुए टहल रहे थे. हमें तस्वीरें लेते देख झट से अंदर कमरे में जाकर बात करने लगे.
हेडमास्टर ने उपस्थिति का रजिस्टर दिखाया. पहली कक्षा में 13 बच्चों का नामांकन था और पांचवी में 32 छात्र थे. इस पर हेडमास्टर राजकिशोर ने कहा कि पास के ही दो विद्यालय बंद हुए हैं. उन्हीं के छात्र हैं जिससे पांचवी में संख्या बढ़ गई है.
वहीं, सातवीं और आठवीं आते-आते तक बच्चों की संख्या का आंकडा 40 को पार कर गया है. आठवीं में 48 बच्चों का नामांकन दर्ज था. हेडमास्टर ने कहा कि इसका पता नहीं चल पा रहा है कि इतने बच्चे कहां से आ गए हैं.
इसी स्कूल के बगल में 100 मीटर की दूरी पर एक प्राइवेट स्कूल चलता है. टीन के शेड के अंदर ही. लेकिन उसमें इस स्कूल से तिगुने अधिक बच्चे हैं. आख़िर ऐसा क्यों?
हेडमास्टर राजकिशोर के बोलने से पहले ही वो शिक्षक बोल पड़े जो फ़ोन से करते हुए क्लास में टहल रहे थे, "ये सब करप्शन की वजह से है."
हमने पूछा करप्शन कर कौन रहा है? इस पर दोनों चुप हो गए.
एएन सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर कहते हैं, "एजुकेशन सिस्टम में गड़बड़ी की शुरुआत यहीं से हुई. नियोजन की प्रक्रिया में कई ख़ामियां थीं. मुखिया, सरपंच, सचिव मिलकर शिक्षक बना रहे थे. जो जिसका चहेता था, उसने उसको शिक्षक बनाया."
पंचायत स्तर पर नियोजन की यह प्रक्रिया साल 2009-10 तक चली. तब TET आया. लेकिन तब तक करीब एक लाख शिक्षकों का नियोजन हो चुका था.
डीएम दिवाकर नियोजित शिक्षकों के राजनीतिक पक्ष की भी बात करते हैं.
वो कहते हैं, "आज के समय में नियोजित शिक्षक एक बड़ा वोटबैंक हैं. ये सबको पता है. इनकी संख्या भर (4.14 लाख) पर न जाएं. इनका प्रभाव एक बड़ी आबादी पर है. वो कई लाख हैं. जो सरकार बनाने की इच्छा रखता होगा वो इनके ख़िलाफ़ जाने की हिम्मत कभी नहीं करेगा."
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