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अटल बिहारी वाजपेयी की हाज़िरजवाबी के 15 क़िस्से

कपटुता कहें, हाज़िरजवाबी कहें या सेंस ऑफ़ ह्यूमर कह लें. यह कोई ऐसा गुण नहीं है जिसे राजनीतिक अहर्ताओं में शुमार किया जाता हो.
लेकिन यह भी सच है कि इसमें पारंगत नेताओं ने इसका सफल राजनीतिक इस्तेमाल भी किया.
दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी की गिनती उनमें बिना किसी शुबहे के की जा सकती है.
वह अपनी वाकपटुता से न सिर्फ़ मुश्किल सवालों से बच जाते थे, बल्कि कई बार पूरे मुद्दे को ही नाकुच कर देते थे. कई बार दूसरे पाले में खड़ा व्यक्ति भी असल बात भूलकर खिलखिला देता था या उनकी हाज़िरजवाबी की रपटीली राह पर फिसल बैठता था.
उनकी ज़िंदग़ी के कुछ ऐसे ही क़िस्से दरपेश हैं, जिनमें उन्होंने भाषा और विनोद के शानदार इस्तेमाल की मिसाल पेश की.टल बिहारी वाजपेयी 1957 में पहली बार सांसद हो गए थे. तब जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री हुआ करते थे. तब अटल को संसद में बोलने का बहुत वक़्त नहीं मिलता था, लेकिन अच्छी हिंदी से उन्होंने अपनी पहचान बना ली थी. नेहरू भी वाजपेयी की हिंदी से प्रभावित थे.
वह उनके सवालों का जवाब संसद में हिंदी में ही देते थे. विदेश नीति हमेशा उनका प्रिय विषय रहा. एक बार नेहरू ने जनसंघ की आलोचना की तो जवाब में अटल ने कहा, "मैं जानता हूं कि पंडित जी रोज़ शीर्षासन करते हैं. वह शीर्षासन करें, मुझे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन मेरी पार्टी की तस्वीर उल्टी न देखें. इस बात पर नेहरू भी ठहाका मारकर हंस पड़े."
अस्सी के दशक में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, वाजपेयी उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार की घटना को लेकर पदयात्रा कर रहे थे. वाजपेयी के मित्र अप्पा घटाटे ने उनसे पूछा, "वाजपेयी, ये पदयात्रा कब तक चलेगी?" जवाब मिला, "जब तक पद नहीं मिलता, यात्रा चलती रहेगी."
सत्तर के दशक में पुणे में वाजपेयी को एक सभा में तीन लाख रूपये भेंट किए जाने थे. इस राशि को मेहनत से जुटाने वाले कार्यकर्ताओं को एक-एक करके वाजपेयी को माला पहनाने का अवसर दिया गया. बार-बार गले तक मालाएं भर जातीं तो वाजपेयी उन्हें उतार कर रख देते. जब भाषण देने लगे तो कहा, "अब समझ आया कि ईश्वर की मूर्ति पत्थर की क्यों होती है. ताकि वह भक्तों के प्यार के बोझ को सहन कर सके."
वाजपेयी अपनी वाकपटुता से अनचाहे सवालों से बच निकलते थे. सन 1984 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद जब कांग्रेस को 401 सीटों पर प्रचंड जीत मिली तो लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि ये लोकसभा नहीं, शोकसभा के चुनाव थे.
कांग्रेस इतनी मज़बूत दिख रही थी कि अगले चुनाव में कांग्रेस को हराने के लिए गठबंधन ज़रूरी था. वीपी सिंह भाजपा से गठबंधन नहीं चाहते थे, लेकिन कुछ मध्यस्थों के समझाने पर सीटों के समझौते के लिए राज़ी हो गए थे.
चुनाव प्रचार के दौरान ही एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, जिसमें वाजपेयी और वीपी सिंह दोनों मौजूद थे, पत्रकार विजय त्रिवेदी ने वाजपेयी से पूछा, "चुनावों के बाद अगर बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती है तो क्या आप प्रधानमंत्री पद की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार होंगे?"
फरवरी 1991 में जयपुर में बीजेपी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक हुई. बैठक के आख़िरी दिन जब वाजपेयी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे तो वरिष्ठ पत्रकार नीना व्यास ने पूछा, "सुना है वाजपेयी जी आज कल आप पार्टी में मार्जिनलाइज़ हो गए हैं, हाशिये पर आ गए हैं?"
वाजपेयी ने सवाल अनसुना कर दिया. दोबारा वही सवाल पूछा गया तो वाजपेयी ने कहा, "नहीं नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है."
लेकिन नीना व्यास मानने वाली नहीं थीं. उन्होंने फिर कहा कि अब तो ज़्यादातर लोग मानने लगे हैं कि आप पार्टी में मार्जिनलाइज़ हो गए हैं. वाजपेयी ने तब अपने ही अंदाज़ में जवाब दिया, "कभी-कभी करेक्शन करने के लिए मार्जिन का इस्तेमाल करना पड़ता है."
वाजपेयी ने गठबंधन सरकार चलाई और इसे चलाने में उनका व्यवहार बहुत काम आया. पर मुश्किलें कम न थीं. जयललिता और ममता बनर्जी की रोज़ रोज़ की मांगें उनके लिए सिरदर्द बनी रहती थीं. ममता बनर्जी मंत्रालयों के बंटवारे और उनके काम-काज को लेकर जब-तब नाराज़गी ज़ाहिर करती रहती थीं.
वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय के मुताबिक, जब ममता रेल मंत्री थीं तो आए दिन कोई न कोई मुसीबत खड़ी हो जाती. एक बार पेट्रोल-डीज़ल के दामों को लेकर ममता नाराज़ हो गईं. वाजपेयी ने अपने संकटमोचकों में से एक जॉर्ज फर्नांडीज़ को ममता को मनाने के लिए कोलकाता भेजा.
जॉर्ज शाम से पूरी रात तक इंतज़ार करते रहे पर ममता ने मुलाक़ात नहीं की. इसके बाद एक दिन अचानक प्रधानमंत्री वाजपेयी ममता के घर पहुंच गए. उस दिन ममता कोलकाता में नहीं थीं. वाजपेयी ने ममता के घर पर उनकी मां के पैर छू लिए और उनसे कहा, "आपकी बेटी बहुत शरारती है, बहुत तंग करती है." बताते हैं कि इसके बाद ममता का ग़ुस्सा मिनटों में उतर गया. में हिमाचल प्रदेश में चुनाव थे. कानपुर के जेके सिंघानिया कंपनी के एक छोटे विमान में वाजपेयी के साथ भाजपा नेता बलबीर पुंज और दो लोग सफ़र कर रहे थे. उन्हें धर्मशाला पहुंचना था. वाजपेयी सो रहे थे.
तभी विमान का सह-पायलट कॉकपिट से निकला और उसने पुंज से कहा, "क्या आप पहले कभी धर्मशाला आए हैं?" पुंज ने पूछा, "लेकिन आप ये क्यों पूछ रहे हैं?"
पायलट ने जवाब दिया, "इसलिए क्योंकि हमें धर्मशाला मिल नहीं रहा. एटीसी से भी कोई संपर्क नहीं हो पा रहा और हमारे पास जो नक्शा है, वो दूसरे विश्व युद्ध के समय का है और इससे कुछ भी मेल खाता नहीं दिख रहा."
पुंज ने कहा, "बस इसे चीन मत ले जाना." इतने में वाजपेयी की आंख खुली तो उन्होंने कहा, "सभा का समय हो रहा है, हम कब उतर रहे हैं?" पुंज ने उन्हें सब हाल बताया तो वाजपेयी बोले, "यह तो बहुत बढ़िया रहेगा. ख़बर छपेगी- वाजपेयी डेड. गन कैरेज में जाएंगे."
पुंज ने कहा, "आपके लिए तो ठीक है, मेरा क्या होगा?" वाजपेयी बोले, "यहां तक साथ आए हैं तो वहां भी साथ चलेंगे." फिर कहा, "जागते हुए अगर क्रैश हुआ तो बहुत तक़लीफ़ होगी." इतना कहकर वो दोबारा सो गए. बाद में इंडियन एयरलाइंस के एक विमान से संपर्क हुआ और वाजपेयी के विमान को पीछे आकर कुल्लू में लैंडिंग कराने का निर्देश दिया गया. विमान धर्मशाला के बजाय कुल्लू में उतरा. जनसभा छूट ही चुकी थी, इसलिए वाजपेयी बिना किसी फ़िक्र के गेस्ट हाउस में जाकर सो गए.
एक बार उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर में जनसंघ और कांग्रेस की सभाएं थीं. कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पंडित गोविंद वल्लभ पंत की सभा चार बजे होनी थी और उसी मैदान पर जनसंघ की सभा शाम 7 बजे होनी थी.
लेकिन गोविंद वल्लभ पंत चार बजे के बजाय, देरी से सात बजे पहुंचे. अब दुविधा हुई कि किसकी सभा पहले हो. जब जनसंघ के कार्यकर्ताओं ने वाजपेयी से पूछा तो उन्होंने कहा कि पहले पंत जी को करने दीजिए, इससे मुख्यमंत्री का सम्मान भी रह जाएगा और हमें उनका भाषण भी सुनने को मिल जाएगा, जिसका जवाब हम अपने भाषण में देंगे.
वाजपेयी ने शादी नहीं की. हालांकि मिसेज कौल प्रधानमंत्री आवास में भी उनके साथ रहीं लेकिन पत्नी की हैसियत से नहीं. प्रधानमंत्री प्रोटोकॉल के हिसाब-किताब में उनका नाम नहीं था. वाजपेयी की आलोचना करने वाले नेताओं और दलों ने भी कभी इस निजी मसले को राजनीति के मैदान में नहीं घसीटा. यह प्रेम की एक ऐसी अलिखित कहानी थी, जिसे कोई नाम नहीं मिला.
शादी न करने पर वाजपेयी का यह जवाब बड़ा चर्चित है. उन्होंने कहा था, "मैं अविवाहित हूं…" फिर अपना चिर-परिचत विराम लेकर बोले, "लेकिन कुंवारा नहीं."

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